आत्मसमर्पण: आध्यात्मिक समर्पण की गहराई
अवतार सिंह जी जज पटेला श्री आजाद श्रीवा महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। आपके अत्यधिक ज्ञान से हमें यह समझ आई कि भजन सिमरण की वास्तविक संपत्ति के बिना इस संसार सागर से पार पाना अत्यंत कठिन है। संसार की माया हमें अपने परिवार में उलझा देती है।
गुस्से का नाटक और उसकी आवश्यकता
जब हम संसार की स्थिति में सरकारी कामकाज के दौरान किसी के कार्य में कमी देखते हैं, हमें इसके प्रति गुस्सा आ जाता है। लेकिन, महाराज जी की दृष्टि में, गुस्सा एक नाटक होना चाहिए, ना कि आंतरिक भावना। यह जगत एक नाटक मंच है जहाँ गुस्सा का प्रदर्शन आवश्यक है। वास्तविक क्रोध नहीं बल्कि उसके प्रदर्शन से कर्म को भगवान के समर्पित कर देना चाहिए। जीवन में यह एक साधन है जो हमारी अध्यात्मिक प्रगति में मदद करता है।
निरंतर भजन सिमरण की शक्ति
नाम का निरंतर स्मरण साधकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है। महाराज जी का सुझाव है कि हर पांच मिनट में राधा नाम का अभ्यास करते रहना हमें उस निरंतरता की ओर ले जाता है, जो दिव्यता को प्राप्त करने का प्रमुख साधन है। जब मन बार-बार विषयों में उलझता है, तो उसे प्रभु में लगाने की दिशा में मेहनत करके, अंततः मन को स्थिर किया जा सकता है।
आत्मसमर्पण की सच्ची समझ
संपूर्ण आत्मसमर्पण तभी होता है जब हमारे पास किसी भी प्रकार के बाहरी सहारे नहीं होते। जैसे गजेंद्र ने तब भगवान को पुकारा जब उसे कोई अन्य सहायता प्राप्त नहीं रही। यह स्थिति बताती है कि बल, पद, धन, बुद्धि के अभिमान को त्यागकर ही आत्मसमर्पण की गहराई को पाया जा सकता है।
स्वसत्ता का परित्याग
आत्मसमर्पण अहंकार के गलने की प्रक्रिया है। यह तब घटित होता है जब हमें यह अनुभव होता है कि हम हारे गए हैं और हमें भगवान की शरणागति ही एकमात्र उपाय है। यह ज्ञानेन्द्रियों के नियंत्रण से परे होता है और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना उत्पन्न करता है।
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FAQs
1. प्रश्न: गुस्से का नाटक क्यों करना चाहिए?
उत्तर: गुस्से का नाटक आवश्यक कर्म को सक्षम करने के लिए है, लेकिन इसे सत्य स्वरूप में अपनाना नहीं चाहिए।
- प्रश्न: भजन सिमरण कैसे करते रहें?
- प्रश्न: आत्मसमर्पण की सच्ची भावना कैसे उत्पन्न करें?
- प्रश्न: ध्यान कैसे भटकने से बचें?
- प्रश्न: दिव्यता प्राप्त करने के उपाय क्या हैं?
निष्कर्ष
महाराज जी के प्रसंग से हमें यह पता चला कि गुस्से का प्रदर्शन एक नाटक है और यह समझना कि यह हमारे आंतरिक विकास के लिए आवश्यक है। निरंतर भजन सिमरण और आत्मसमर्पण के माध्यम से हम अपने जीवन में आत्मिक विकास और दिव्यता की प्राप्ति में सक्षम हो सकते हैं। हमें अपने गुरुओं की शिक्षा को अपने जीवन में शामिल कर, भक्ति मार्ग पर चलना चाहिए।

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Originally published on: 2024-06-26T12:08:54Z
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