गुरुजी के वचनों का गहरा सन्देश: आत्मसमर्पण और क्रोध का नाटक

आत्मसमर्पण का रहस्य

गुरुजी की वाणी हमें आत्मसमर्पण के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए प्रेरित करती है। जीवन में जब तक हम अपने बल – चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो, या किसी अन्य रूप में – को पूरी तरह छोड़ नहीं देते, तब तक सच्चा आत्मसमर्पण संभव नहीं होता। जैसे द्रौपदी ने अपने बल को छोड़कर केवल भगवान श्रीकृष्ण का आह्वान किया, वैसे ही हमें भी अपने अंदर आत्मसमर्पण की भावना को जगाना होगा। यह प्रक्रिया उस समय शुरू होती है जब जीवन में किसी भी तरह का अन्य सहारा दिखाई नहीं देता।

गज़ेंद्र की कथा, जिसका उल्लेख गुरुजी ने किया, इसी भाव को और स्पष्ट करती है। जब तक गज़ेंद्र के पास उसकी सहायक हाथिनिया थीं, उसने भगवान को याद नहीं किया। लेकिन जब कोई सहारा नहीं बचा, तब उसने परमात्मा को पुकारा। यही वह स्थिति है जब हम कहते हैं कि “निर्बल के बल राम”।

क्रोध का नाटक

गुरुजी बताते हैं कि संसार एक नाटक मंच है, और इसमें क्रोध करना आवश्यक है लेकिन आंतरिक रूप से नहीं। बाहरी रूप से क्रोध का प्रदर्शन करना एक युक्ति के समान है, जिसका उद्देश्य समाज के भिन्न व्यक्तियों का संचालन करना है। यह एक नाट्य प्रदर्शन है जिसमें अंदर से आप क्रोधित नहीं होते लेकिन अभिनय करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, राजा राम समुद्र के सामने हाथ जोड़कर बैठे रहे, पर जब तीन दिन बाद भी परिणाम नहीं मिला, तब उन्होंने अग्नि बाण संधान किया।

इसका तात्पर्य यह है कि हमें व्यवहारिक जीवन में कभी-कभी कठोर होना पड़ता है, परन्तु अंदर से हमें शांत रहना चाहिए। यह नियंत्रण हमें गलत कार्यकलापों से बचाता है और हमारे कर्मों को भगवान को समर्पित करने की दिशा में अग्रसर करता है।

भजन और नामस्मरण की महत्ता

साधकों के लिए निरंतर भजन और नामस्मरण करना गुरुजी की एक अन्य महत्वपूर्ण शिक्षा है। भजन सिमरण की कमाई के बिना संसार सागर को पार करना असंभव है। गुरुजी ने सरल तरीके से “राधा राधा” नाम का स्मरण करने की विधि सुझाई है। हर 5 मिनट में एक बार राधा के नाम का उच्चारण करें। यह विधि इस उद्देश्य से बनाई गई है कि निरंतर नामस्मरण से हमारा मन अंततः इस प्रक्रिया को आत्मसात कर लेगा।

ऐसी आदत बनाएं जिससे मन विषय में न बंधे

गुरुजी ने हमें यह बताया कि विषयों का ध्यान करना हमें व्यक्तिगत और आध्यात्मिक रूप से हताश करता है। जब से सृष्टि का निर्माण हुआ है, मन ने हमें भोगों में फंसा कर रखा है। यह हमारे भजनों और ध्यान को बाधित करता है। गुरुजी कहते हैं कि विषयों का ध्यान हमें पुनर्वार्ता और गलत संस्कारों की ओर ले जाता है। उनका समाधान यह है कि बार-बार भगवान के नाम का स्मरण किया जाए।

FAQs

1. क्रोध का नाटक करने से क्या लाभ होता है?
क्रोध का नाटक करना आवश्यक है ताकि समाज और स्वयं के अनुशासन में संतुलन रहे। यह एक मानसिक युक्ति है जिससे हम अपने कार्यों को भगवान को समर्पित कर सकते हैं।

2. आत्मसमर्पण की सही प्रक्रिया क्या है?
आत्मसमर्पण तब होता है जब हम अपने सभी प्रयास और बल त्यागकर पूरी तरह भगवान पर भरोसा करते हैं, जैसे द्रौपदी ने किया था।

3. भजन और नामस्मरण का महत्व क्यों है?
भजन और नामस्मरण हमें माया से दूर रखते हैं और भगवान की शरण में ले जाते हैं। यह आतंरिक शांति और भक्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

4. विषय भोगों का ध्यान कैसे छोड़ें?
विषय भोगों का ध्यान छोड़ने का तरीका है निरंतर भगवान के नाम का स्मरण करना। यह एक अभ्यास है जो हमें अनुशासन में रखता है।

5. मन को कुशल साधक कैसे बनाएं?
मन को कुशल साधक बनाने के लिए बार-बार भजन और नामस्मरण का अभ्यास करना चाहिए। यह विधि मन को अनुशासित और भगवान की ओर केंद्रित करती है।

नाटकीय जीवन के धर्म का पालन

गुरुजी की इस प्रेरक अनुशंसा का सार यह है कि संसार में रहते हुए हमें अपने कर्तव्यों को निभाना चाहिए। इस प्रक्रिया में आत्मसमर्पण और क्रोध नियंत्रण के नाटकीय तत्व हमें समाज में कर्मयोगी बनाए रखते हैं। अंतत: हर कर्म भगवान को अर्पित करना ही हमारे आत्मसमर्पण की अंतिम अवस्था है। यही आध्यात्मिकता की सच्ची भावना है।

गुरुजी का उपदेश इस बात पर जोर देता है कि हम निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें, और यह समझें कि हर स्थिति एक आध्यात्मिक दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देती है। हम सभी भजन, Premanand Maharaj की भक्ति, और divine music के माध्यम से आदर्श जीवन की ओर प्रेरित होते हैं। आध्यात्मिक परामर्श और हमारी आत्मिक उन्नति में free astrology और free prashna kundli सेवाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। अधिक जानकारी के लिए आप Live Bhajans पर जाकर spiritual guidance और ask free advice प्राप्त कर सकते हैं।

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Originally published on: 2024-06-26T12:08:54Z

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