मान लो, मानते चलो — प्रभु का साक्षात्कार मान्यता से आरम्भ होता है

प्रस्तावना

जीवन में अनेक लोग पूछते हैं — भगवान कब और कैसे मिलते हैं? श्री हरिवंश महाराज जी के उपदेशों में इसका सरल उत्तर है: जब मनुष्य को केवल भगवान ही चाहिए, तब वे स्वयं प्रकट हो जाते हैं। यह कोई जटिल आध्यात्मिक सिद्धि नहीं, बल्कि भाव की परिपक्वता है।

भगवान की प्राप्ति कठिन कैसे नहीं है

महाराज जी समझाते हैं कि शरीर के साथ रहते हुए वासनाएँ और विषय आकर्षण स्वाभाविक हैं। कठिनाई वासनाओं में नहीं, हमारी दृष्टि में है। जब हम विषयों को स्वीकार करते हैं, तो विषय स्फुरण बढ़ता है। जब हम प्रभु को स्वीकारते हैं, तो स्फुरण प्रभु का हो जाता है। यही साधना की कुंजी है।

  • हम विषयों में सुख खोजते हैं; परंतु सुख का स्रोत तो परमात्मा है।
  • यदि दिशा बदल जाए, तो साधारण जीवन भी भगवान की ओर यात्रा बन सकता है।
  • अभ्यास के द्वारा विवेक जागृत होता है, और विवेक के साथ मायाबद्धता ढीली पड़ती है।

शरीर नहीं, स्वरूप में भगवत् प्राप्ति

हम प्रभु के अंश हैं। शरीर में तो केवल विषयों की मांग उत्पन्न होती है, परंतु स्वरूप में केवल प्रेम की मांग रहती है। जब साधक अपने स्वरूप की ओर लौटता है, तब उसका हर विचार, हर भावना दिव्य हो उठती है। यह स्थिति दूर नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अभ्यास से सुलभ होती है।

तीन आवश्यक साधन

  • नाम जप: यह साधक का जीवन रस है। नाम जप से मन स्थिर होता है और अंतःकरण निर्मल।
  • भजन: भजन केवल गान नहीं, हृदय का संवाद है। आप चाहें तो भजनों के माध्यम से इस अनुभव को गहरा बना सकते हैं।
  • गुरु आज्ञा में चलना: जब मन और बुद्धि गुरु को समर्पित होती है, तब साधक का पथ स्वयं प्रकाशित हो जाता है।

गुरु के प्रति समर्पण

महाराज जी कहते हैं — मन और बुद्धि कोई वस्तु नहीं, इन्हें देने का अर्थ है कि अब उनकी दिशा गुरु आज्ञा में ही चलेगी। यह समर्पण साधक को गुरु-स्वरूप बना देता है। इससे भक्ति का मार्ग सरल और आनन्दमय बनता है।

वृन्दावन का रहस्य

वृन्दावन स्थान मात्र नहीं, भगवान का चिदानंदमय धाम है। जब साधक वहां का प्रेम करता है, तो वही प्रेम उसे भीतर के वृन्दावन तक ले जाता है। अंतरदृष्टि खुलने पर, दूर रहकर भी वह धाम की उपस्थिति को अनुभव करता है।

महाराज जी कहते हैं — भजन के जल में अगर माया का फेन दिखे, तो उसे हटाकर देखो। नीचे निर्मल चिदानंद जल है। वही वृन्दावन है जो हर हृदय में है।

आज का सन्देश (Message of the Day)

श्लोक (परभावित): “जब विवेक जागृत होता है, तब मान्यता भ्रान्ति से सत्य की ओर मुड़ती है — और वही मोक्ष का द्वार है।”

आज के तीन अभ्यास

  • मन में बार-बार दोहराएँ – “मैं प्रभु का हूँ, प्रभु मेरे हैं।”
  • दिन में कम से कम एक बार शांत होकर नाम का जप करें।
  • किसी एक अच्छे कर्म में समर्पण जोड़ें – सेवा, मुस्कान, या क्षमा।

मिथ: भक्ति केवल संन्यासियों के लिए है

सत्य: भक्ति घर-गृहस्थी में, कार्यस्थल में, या किसी भी स्थिति में संभव है। भगवान भाव देखते हैं, परिचय नहीं।

भक्ति का गूढ़ रहस्य

भक्ति का आरंभ “मानने” से होता है। ज्ञानी “जानकर” मानता है, पर भक्त “मानकर” जानता है। यह मान्यता ही उसे दिव्यता के अनुभव तक ले जाती है।

  • “मान लो कि श्री जी तुम्हारे भीतर हैं।”
  • “मान लो कि वृन्दावन यहीं है।”
  • “मान लो कि तुम अभी से शरणागत हो।”

भक्ति का यही सौंदर्य है — पहले भाव बनाओ, फिर वही भाव सत्य हो जाता है।

FAQs

1. क्या भगवान को देखना संभव है?

हाँ, जब हृदय निर्मल होता है और मन स्थिर, तब अनुभूति स्पष्ट होती है। यह दृष्टि बाहर नहीं, भीतर के अनुभव से आती है।

2. विषयों से मन हटे कैसे?

मन को रोकने से नहीं, दिशा बदलने से यह होता है। नाम जप और भजन से मन सहज रूप से श्री जी की ओर मुड़ता है।

3. गुरु को मन-बुद्धि देना क्या है?

अर्थात अब निर्णय और विचार गुरु आज्ञा के अनुसार होंगे। यह आत्मविकास का प्रारंभ है।

4. क्या वृन्दावन के बिना भगवद् अनुभूति संभव है?

हाँ, क्योंकि वृन्दावन मन की दशा है। जहां भक्ति है, वहीं धाम है।

5. क्या हर कोई दिव्य प्रेम अनुभव कर सकता है?

प्रेम हर आत्मा का स्वभाव है। अभ्यास और श्रद्धा से कोई भी इसे जागृत कर सकता है।

अन्तिम प्रेरणा

भक्ति का मार्ग प्रतिदिन छोटे-छोटे अनुशासनों से बनता है। वह कहीं दूर नहीं — वही आपके हृदय में है। बस मानते चलो, करते रहो, नाम जपते रहो, और देखना – एक दिन तुम वही जान जाओगे, जिसमें सारा संसार समा जाता है।

For more information or related content, visit: https://www.youtube.com/watch?v=gZBRc8iisnE

Originally published on: 2022-11-17T12:35:27Z

Post Comment

You May Have Missed