गिरिराज जी के अभिषेक से जागृत होने वाली भक्ति की लहर
गिरिराज जी का अभिषेक: एक अंतर्मन की जागृति
ब्रज की भूमि पर जब गिरिराज जी का अभिषेक होता है, तब केवल जल की धाराएँ ही नहीं बहतीं, बल्कि भक्तों के हृदयों में प्रेम की लहरें भी उमड़ पड़ती हैं। इस पवित्र क्षण में हर ब्रजवासी अपने भाव से प्रभु के चरणों को सींचता है। ऐसा लगता मानो पूरा वातावरण प्रेमानंद से भर गया हो, और मन के भीतर से अहंकार जैसे ओझल हो जाए।
गुरुजी ने कहा था कि गिरिराज जी के दर्शन तभी फलदायी होते हैं जब हृदय निर्मल हो। जब हम अपने भीतर के कण-कण को प्रेम से धोते हैं, तब गिरिराज समान धैर्य और दया हमारे भीतर स्थिर होती है।
भक्ति का भाव
- भक्ति का अर्थ केवल पूजा करना नहीं है, बल्कि हर क्षण में प्रभु के स्मरण को जीवित रखना है।
- गिरिराज जी से जुड़ना आत्मा से प्रकृति की ओर लौटना है।
- ब्रजवासियों का यही भाव है — जब तक सुबह के दर्शन न हों, दिन शुभ नहीं बीतता।
प्रेम की प्रतिध्वनि
गुरुजी ने प्रेमानंद बाबा का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा प्रेम वही है जो किसी रिश्ते या संबोधन से परे हो। प्रेमानंद का अर्थ है — आनंद में डूबा प्रेम। जब मन इस आनन्द में लीन होता है तो व्यक्ति को जग और परिस्थितियाँ अपनी ओर नहीं खींचतीं।
ब्रज का प्रेम केवल देखने की वस्तु नहीं, जीने का तरीका है। प्रतिदिन जब सूर्योदय होता है और गिरिराज पर प्रातः जल चढ़ाया जाता है, तब भक्त अपने मन को उसी प्रकाश से शुद्ध करते हैं।
संदेश का सार
आज का संदेश
“जहाँ भाव निर्मल होता है, वहीं गिरिराज जी का आशीर्वाद उतरता है।”
श्लोक (परिभाषित)
“निर्मलं हृदयं यस्य, तस्य गिरिराजो स्वयं रक्षां करोति।” — जो मन में प्रेम और शुद्धता रखता है, उसी की गिरिराज जी अनुभूति करते हैं।
आज के तीन अभ्यास
- प्रातः उठकर कम से कम पाँच मिनट गिरिराज जी और नंदलाल का स्मरण करें।
- किसी एक ब्रजवासी या साधक से प्रेमपूर्ण संवाद करें; यह हृदय को नम्रता सिखाता है।
- दिन में एक बार मौन रहकर अपने भावों को निरीक्षण करें — यह आत्मसाक्षात्कार की दिशा में पहला कदम है।
मिथक और सच्चाई
मिथक: गिरिराज जी का अभिषेक केवल पुरोहित या ब्राह्मण कर सकते हैं।
सत्य: अभिषेक का मूल भाव कर्म नहीं, श्रद्धा है। कोई भी व्यक्ति जो निर्मल मन से गिरिराज जी की पूजा करता है, उस पर कृपा बरसती है।
अंतर्मन की शांति का मार्ग
भक्ति का मार्ग कठिन नहीं, परंतु सतता की मांग करता है। जब कभी मन विचलित हो, गिरिराज जी का नाम स्मरण करें। यही “ना दिन बढ़िया ना जावे” का भाव छुपा है — जब तक दर्शन न हों, आत्मा को शांति नहीं मिलती।
गुरुजी की वाणी प्रेरक है — “धरण की आज सुबह गिरिराज जी का अभिषेक किया वहां और गिरिराज जी की कथा करी।” यह भाव केवल दोहराने के लिए नहीं है; यह कर्म से साधना की ओर प्रेरित करता है। जब हम कथा सुनते हैं, तो हमें उसमें समर्पित होना चाहिए जैसे मिट्टी वर्षा को समर्पित होती है।
आध्यात्मिक संगति का महत्व
संगति वही होती है जो हमें भीतर से नया बना दे। यदि मिलन तोते जैसी प्रीत लग जाए — यानी हृदय में स्थायी लगन जाग जाए — तब हर दिन दिव्यता का अनुभव संभव है।
आप चाहें तो spiritual guidance लेकर अपनी साधना को और गहराई दे सकते हैं। वहां आपको प्रेमानंद महाराज के प्रवचन और भक्ति की अनुभूतियों से परिचय मिलेगा।
प्रेरणा के सूत्र
- भक्ति में समय कम नहीं पड़ता, केवल भाव की आवश्यकता होती है।
- दिन की शुरुआत प्रेम भरे विचारों से करें।
- गिरिराज जी की कृपा उसी को मिलती है जो दूसरों की भलाई में अपना हित देखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: गिरिराज जी के अभिषेक का सही समय क्या होता है?
प्रातः सूर्योदय के समय अभिषेक उत्तम माना गया है, क्योंकि तब प्राकृतिक ऊर्जा सबसे शांत होती है।
प्रश्न 2: क्या घर पर गिरिराज जी की पूजा की जा सकती है?
हाँ, यदि श्रद्धा और भावनाएँ निर्मल हों तो घर में भी गिरिराज जी की पूजा पूर्ण होती है।
प्रश्न 3: प्रेमानंद बाबा का भाव क्या दर्शाता है?
यह भाव दर्शाता है कि सच्ची भक्ति आनंद से सम्पन्न होती है; यह प्रेम का अति सूक्ष्म रूप है।
प्रश्न 4: क्या गिरिराज जी की कथा सुनने से मानसिक शांति मिलती है?
हाँ, कथा सुनना मन को भक्तिमय लय देता है। यह ध्यान का सरल माध्यम है।
प्रश्न 5: ब्रजवासियों के भाव से हमें क्या सीखना चाहिए?
ब्रजवासी सिखाते हैं कि प्रेम ही सबसे बड़ी साधना है — जब तक प्रेम जीवित है, दिव्यता का अनुभव सहज है।
गिरिराज जी की कृपा से आज का दिन प्रेम से भरा हो, यही हमारी प्रार्थना है।
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Originally published on: 2024-11-02T15:11:25Z



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