सहनशीलता का अमृत: अंतर्मन की शांति का मार्ग
सहनशीलता का अमृत
जीवन में जब कोई हमें अपमानित करता है, हमारे ऊपर कठोर शब्द कहता है, या अन्याय करता है — तब मन स्वाभाविक रूप से दुखी होता है। परंतु सच्ची साधना वहीं है जब हम बाहर से शांत रहते हैं। यही गुरुजन की कृपा का वास्तविक प्रमाण है।
गुरुजी का संदेश है — “बाहर से कठोर मत बनो, भीतर से दुखी हो सकते हो, पर वचन से कटुता मत फैलाओ।” यह मार्ग प्रारंभ में कठिन प्रतीत होता है, पर यही साधना आत्म-संयम की सीढ़ी है।
अंदर की ज्योति पहचानिए
प्रत्येक परिस्थिति में हमारे ईष्ट की दृष्टि सदैव हमारे ऊपर होती है। जब हम संयम रखते हैं, तब हम अपने भीतर की ज्योति को उजागर करते हैं। यह समझ ही हमें असली आत्मबल देती है। बाहरी संसार बदल नहीं सकता, पर हमारा दृष्टिकोण जरूर बदल सकता है।
- प्रतिस्थिति चाहे प्रतिकूल ही क्यों न हो, उसे ईश्वर की योजना मानें।
- गुस्से के क्षण में श्वास पर ध्यान दीजिए और मौन रहिए।
- हर अपमान को आत्म-विकास का अवसर समझिए।
श्लोक (परिवर्तित अर्थ)
“जो अपमान को भी प्रसाद समझे, वही सच्चा साधक है।”
दिव्य दृष्टिकोण
गुरुजी बताते हैं कि समर्थ साधक वही है जो प्रतिकूलता में क्रोध न करे। जब मनुष्य स्थिर होता है, तो कर्म करने वाली शक्ति स्वयं प्रभु बन जाती है। संसार की व्यवस्था अद्भुत है: जो हमारे प्रति त्रुटि करता है, उसका न्याय समय और नियम से अपने आप होता है।
यही कारण है कि वे कहते हैं — अपने भीतर मौन और करुणा का निर्माण करें। चुप रहना दुर्बलता नहीं; यह तो आत्म-बल का प्रदर्शन है।
सहज अभ्यास
- प्रत्येक सुबह तीन मिनट मौन ध्यान करें।
- किसी ने कुछ कहा हो, उत्तर देने से पहले तीन गहरी साँस लें।
- हर रात अपने दिन के किसी कटु क्षण को देखकर स्वयं को माफ करें।
मिथक बनाम सत्य
मिथक: अगर हम प्रतिक्रिया नहीं देंगे तो लोग हमें कमजोर समझेंगे।
सत्य: वास्तव में मौन व्यक्ति के भीतर वह शक्ति होती है जो बाहरी शोर से परे है। उसे अंदर से कोई हिला नहीं सकता। यह ही ईश्वर के निकटता का प्रमाण है।
आज का संदेश
संदेश: जो अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रख लेता है, वह संसार पर नियंत्रण पा लेता है।
तीन आज के कर्म
- किसी आलोचना या कठोरता के उत्तर में मुस्कान रखिए।
- मन में प्रतिशोध न पालें — ‘सब ईश्वर की योजना है’ कहकर छोड़ दें।
- किसी एक व्यक्ति को आज माफ करें, भले ही वह उपस्थित न हो।
एक स्पष्टता (मिथक-भंजन)
सहनशीलता का अर्थ पलायन नहीं है। यह सक्रिय सजगता है जहाँ हम सजग होकर मौन होते हैं, न कि भीरु होकर।
गुरु-भक्ति और साधना का गूढ़ सूत्र
गुरुजी कहते हैं, “प्रतिकूलता में भी ईश्वर को धन्यवाद दो।” जब हम किसी कठिनाई को आभार के साथ स्वीकार करते हैं, तो वह कठिनाई हमारे भीतर करुणा में परिवर्तित हो जाती है। यह साधक के भीतर ‘अनुग्रह’ का द्वार खोलती है।
जितना हम मौन में उतरते हैं, उतना ही अनुभव होता है कि वास्तव में कोई ‘दूसरा’ है ही नहीं, सब प्रभु की लीला है।
संगीत और साधना
यदि मन व्याकुल हो, तो सुरों में डूब जाइए। भजनों की मधुर धारा आत्मा को शीतल करती है और भावनाओं को संतुलित करती है। हर सुर उस मौन की ओर ले जाता है जहाँ प्रतिक्रिया का शोर मिट जाता है।
FAQs
1. क्या सहनशीलता कमजोरी है?
नहीं, यह तो आंतरिक शक्ति की पहचान है। विपरीत शब्द सहना आसान नहीं; इसके लिए गहरी साधना चाहिए।
2. अगर मैं बार-बार गुस्सा कर दूँ तो?
कोई बात नहीं, फिर से नियम लीजिए। साधक वही जो हर बार गिरकर भी उठता रहे।
3. जब कोई अन्याय करे तो क्या चुप रहना चाहिए?
मौन का अर्थ गलत को स्वीकारना नहीं, बल्कि सही समय पर शांति से कहना है।
4. क्या ईश्वर सचमुच हर पल हमारे साथ रहते हैं?
हाँ, श्रद्धा रखने वाला कभी अकेला नहीं होता। ईश्वर की कृपा अक्सर मौन में महसूस होती है।
5. दुख के क्षण में ध्यान किस पर करें?
अपने श्वास पर केंद्रित रहिए, ईश्वर का नाम लीजिए — धीरे-धीरे मन शांत हो जाएगा।
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Originally published on: 2021-07-18T07:24:36Z



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