भय से मुक्ति और शरणागति का रहस्य

प्रस्तावना

जीवन में अक्सर हम भय, दुःख और अनिश्चितता से गुज़रते हैं। कभी लगता है कि सब कुछ हमारे विरोध में है। परंतु जब हृदय वास्तव में भगवान के चरणों पर टिक जाता है, तो भय का स्थान भक्ति ले लेती है। श्री हरिवंश महाराज जी के एक सुन्दर प्रवचन में यह बात अत्यंत हृदयस्पर्शी ढंग से समझाई गई है।

मुख्य कथा: अमरीष जी और दुर्वासा ऋषि

जब दिव्य भक्त महाराज अमरीष जी भगवान में लीन होकर गृहस्थ धर्म निभा रहे थे, तब एक दिन दुर्वासा ऋषि ने उनकी भक्ति की परीक्षा ली। यज्ञ के उपरांत जब भोजन का समय आया, तो ब्राह्मण भोज से पहले स्वयं भोजन करना अनुचित माना जाता था। उसी समय दुर्वासा जी स्नान हेतु चले गए। यज्ञ की अवधि समाप्त होने को थी, अमरीष जी कठिन द्वंद्व में थे—अगर विलम्ब हुआ तो यज्ञ दोष लगेगा, और भोजन करेंगे तो अतिथि का अनादर।

उन्होंने मात्र तुलसीपत्र सहित जल ग्रहण किया, ताकि विधि भी बनी रहे और अतिथि का अपमान भी न हो। दुर्वासा जी लौटे, और क्रोध में भरकर उन्होंने कृत्या उत्पन्न कर दी जो अमरीष जी को भस्म करने को दौड़ी। किंतु भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ, जिसने उस कृत्या को नष्ट किया और दुर्वासा जी को त्राहि-त्राहि करने पर विवश किया। वे तीनों लोकों में भागते रहे, किन्तु आश्रय कहीं न मिला। अंततः वे अमरीष जी के चरणों में आए। भक्त ने उन्हें प्रणाम किया और कहा —“मैं तो आपका सेवक हूँ, आप मेरा अपराध क्षमा करें।” दुर्वासा जी के नेत्रों से अश्रु बहने लगे, उन्हें तत्काल ईश्वरीय शांति प्राप्त हुई।

मर्म

महाराज जी ने कहा — “जब कोई पूर्णतः प्रभु पर भरोसा कर लेता है, तब वही भरोसा उसे हर भय और अपमान से मुक्त करता है।” जैसे अमरीष जी ने किसी प्रतिशोध का विचार नहीं किया, वैसे ही हमें भी हर परिस्थिति में परमेश्वर की योजना पर विश्वास रखना चाहिए।

मोरल इनसाइट

भय केवल वहां जन्म लेता है जहाँ श्रद्धा कमजोर होती है। विश्वास जीवित रहेगा, तो विपरीत परिस्थितियाँ भी सुख का माध्यम बन जाएँगी।

व्यावहारिक अनुप्रयोग

  • १. निरंतर नाम जप करें: जिस नाम में भगवान का स्मरण है, वहीं आपकी आंतरिक ढाल है।
  • २. धर्मपूर्वक निर्णय लें: कठिन स्थिति में भी सत्य के पथ पर स्थिर रहें।
  • ३. दूसरों के प्रति अनुकंपा: जो हमें दुख दे, उसके लिए भी मंगल कामना रखें—यही सच्चा भजन है।

चिंतन प्रश्न

आज अपने किसी भय को पहचानिए। क्या आपने उस भय के नीचे छिपे अविश्वास को देखा है? कुछ पल मौन होकर भगवान का नाम लीजिए और यह भावना करें—“जो होगा, वही मेरे कल्याण के लिए होगा।”

शरणागति का रहस्य

महाराज जी ने कहा कि संसार एक नाट्य है। हम सब अपने अपने रोल निभा रहे हैं—कर्मचारी, पिता, माता, सन्त, या विद्यार्थी। जैसे नाटक के पात्र पर्दे के पीछे असली नहीं होते, वैसे ही हम इस जगत में स्वांग कर रहे हैं। पर निर्देशक एक ही है: श्रीकृष्ण। जब हम यह समझ लेते हैं तो जीवन हल्का, सरल और आनन्दमय हो जाता है।

निर्भयता के तीन चरण

  • निर्भयता: शरणागति का पहला फल है निर्भयता।
  • निश्चिंतता: दूसरा फल है चिंता से मुक्ति।
  • निशोकता: अंतिम फल है दुख और शोक का अभाव।

जब हम यह दृढ़ निश्चय कर लेते हैं कि जो कुछ घट रहा है वह प्रभु की लीला है, तब भय का अंत होता है। यही है शरणागति का सार।

भक्ति का अनुभव

भक्ति तब प्रकट होती है जब हम भगवान के नाम का महत्व समझते हैं। नाम ही साध्य और साधन दोनों है। जब मन बार-बार उसी नाम में डूबने लगे, तब संसार के रस फीके हो जाते हैं। महाराज जी ने कहा — “भक्ति में प्रेम तब जागता है जब भगवान का स्थान हृदय में सबसे ऊपर हो जाए, जहां कोई दुख, सुख या मान-अपमान नहीं पहुँच पाते।”

स्पिरिचुअल टेकअवे

भय का अंत श्रद्धा से होता है, और श्रद्धा का आरम्भ नाम जप से। जब मन में यह स्थिर भाव हो जाए कि “जो कुछ घट रहा है, वह मेरे हित में है,” तब जीवन संतुलन पा लेता है। यही सच्चा आराम, आत्मिक निर्भयता और भगवत शरणागति है। दिव्य संगीत और सत्संग के माध्यम से यह अनुभव और गहरा हो सकता है। यदि आप नियमित bhajans सुनते रहें, तो हृदय स्वतः निर्मल होता जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

१. क्या भय का पूर्ण अंत संभव है?

जब हम भगवान के चरणों को अपना सुरक्षित ठिकाना मान लेते हैं, तब भय स्वाभाविक रूप से विलीन हो जाता है।

२. विपरीत परिस्थिति में शांति कैसे रखें?

प्रार्थना और नाम जप के माध्यम से अपनी चेतना को भगवान पर टिकाए रखें। धीरे-धीरे मन शांत हो जाएगा।

३. क्या संसारिक कर्म करते हुए भी भक्ति हो सकती है?

हाँ, यदि कर्म को स्वांग मानेँ और हर कार्य को भगवान के लिए अर्पण करें तो वही भक्ति बन जाता है।

४. दूसरों के उपहास से कैसे निपटें?

जो मार्ग सत्य है, उसे दूसरों की दृष्टि से नहीं तोलना चाहिए। धैर्य रखें, फल समय पर मिलेगा।

५. क्या नाम जप से प्रारब्ध कर्म मिट सकते हैं?

नाम जप वही दिव्य आग है जो पुराने पापों को राख कर देती है, यदि श्रद्धा सच्ची हो।

For more information or related content, visit: https://www.youtube.com/watch?v=NiujpPROtA8

Originally published on: 2024-07-17T15:09:35Z

Post Comment

You May Have Missed