शुद्ध आहार और सरल जीवन से बुद्धि का उज्ज्वल प्रकाश
प्रस्तावना
आज के जीवन में हम उतनी ही तेजी से दौड़ रहे हैं जितनी तेजी से हमारी आदतें बदल रही हैं। कभी घर में अम्मा बच्चों को पढ़ने जाने से पहले मक्खन और मठा देती थीं, ताकि बुद्धि लगे, तन स्वस्थ रहे और मन प्रसन्न। अब वही बच्चे तैयार‑खाने, चाय‑कॉफी और कुरकुरे स्वादों के आदी होते जा रहे हैं। यह परिवर्तन केवल स्वाद का नहीं, यह संस्कारों का भी परिवर्तन है।
पुरानी जीवनशैली की मिठास
गुरुजी ने अपने प्रवचन में बाल्यकाल के उस दृश्य को याद किया जब बच्चे प्रातःकाल उठकर दौड़ लगाते हुए स्कूल जाते थे। माँ के हाथ की बनी दो रोटियाँ और एक लीटर मठा उनका सुबह का पोषक आहार होता था। वहां ताजगी थी, स्फूर्ति थी और जीवन में संतुलन था।
आज चाउमीन, बेड‑टी और देर तक सोने की आदतें बच्चों की बुद्धि को थका रही हैं। शरीर की ऊर्जा घट रही है और स्मृति शक्ति पर असर पड़ रहा है।
गुरुजी की सबसे मार्मिक कथा
गुरुजी ने एक छोटा प्रसंग सुनाया — एक वृद्ध अध्यापक रोज़ स्कूल के द्वार पर खड़े रहते थे। वे हर बच्चे को देखते और कहते, “बेटा, अपनी भूख पर ध्यान देना। जो तुम खाओगे, वही तुम्हारे विचार बनेंगे।” एक दिन एक छात्र ने मज़ाक में कहा, “गुरुजी, भोजन और विचार का क्या संबंध!”
वृद्ध ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “जिस तेल से दीपक भरोगे, उसी की लौ जलेगी। यदि दीपक में गंदा तेल डालोगे तो धुआँ ही मिलेगा।” वह बच्चा वर्षों बाद बड़ा वैज्ञानिक बना। उसने अपने शोध पर लिखते हुए गुरुजी की बात याद की – ‘स्वच्छ आहार मन की स्वच्छता का बीज है।’
कथा से नैतिक बोध
हमारा आहार हमारे विचारों का स्रोत है। जैसा खाएँगे, वैसा सोचेंगे और वैसा ही कर्म करेंगे।
तीन व्यावहारिक अनुप्रयोग
- प्रातः उठकर हल्का और पौष्टिक भोजन करें, जैसे मठा, दलिया या फल।
- बच्चों को चाय‑कॉफी के स्थान पर दूध या ब्राह्मी जैसे प्राकृतिक पेय दें।
- भोजन करते समय ध्यान या प्रार्थना करें ताकि मन में कृतज्ञता बनी रहे।
सौम्य मनन‑प्रश्न
आज शाम कुछ क्षण रुककर सोचें — “मैं अपने शरीर को क्या दे रहा हूँ? क्या यह मेरा आत्मिक विकास सहारा बन रहा है या रुकावट?”
आधुनिक समय के लिए संदेश
जो हम बच्चों को देंगे, वही राष्ट्र का भविष्य बनेगा। खानपान में सादगी, दिनचर्या में संयम और विचारों में पवित्रता ही समाज की नींव है। हमें फिर से उस सरलता की ओर लौटना होगा जहाँ घर में प्रेम से बना भोजन और स्फूर्त मन की प्राथमिकता थी।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की राह
- परिवार में सप्ताह में एक दिन ‘सात्विक भोजन दिवस’ रखें।
- आहार के साथ सहज भजन या ध्यान का समय जोड़ें।
- बच्चों में भोजन से जुड़े संस्कार, जैसे “अन्न ब्रह्म” का भाव जागृत करें।
आध्यात्मिक निष्कर्ष
शुद्ध आहार केवल शरीर को शक्ति नहीं देता, बल्कि आत्मा को स्थिरता भी प्रदान करता है। जब हम मन‑तन को पोषण देते हैं, तो बुद्धि स्वयं जागृत हो जाती है। यही गुरुजी का संदेश है — “जीवन को सरल रखो, आहार को सात्विक रखो, विचारों को शुद्ध रखो।”
FAQs
1. क्या सात्विक भोजन से वास्तव में बुद्धि तेज होती है?
हाँ, सात्विक भोजन मन को शांत करता है और स्मृति शक्ति को पुष्ट करता है।
2. बच्चों को चाय या कॉफी देने में क्या हानि है?
इनमें कैफीन होता है जो प्राकृतिक ऊर्जा को बाधित करता है। बेहतर है उन्हें पौष्टिक पेय दें।
3. ब्राह्मी पेय का क्या लाभ है?
यह मस्तिष्क को तरावट देता है, तनाव घटाता है और स्मरण शक्ति बढ़ाता है।
4. क्या खानपान परिवर्तन आध्यात्मिक विकास को प्रभावित करता है?
निश्चित रूप से, क्योंकि शरीर और मन एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
5. मुझे आध्यात्मिक विषयों पर मार्गदर्शन कहाँ मिल सकता है?
आप spiritual guidance प्राप्त कर सकते हैं और जीवन को अधिक संतुलित बना सकते हैं।
समापन
गुरुजी का संदेश हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र का भविष्य हमारे बच्चों के स्वस्थ तन‑मन में बसता है। सरल जीवन, शुद्ध आहार और सात्विक भावना ही स्थायी सुख का मार्ग है।
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Originally published on: 2024-12-08T10:16:52Z



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