वासना से उपासना की ओर – प्रेमानंद महाराज जी की अनमोल प्रेरणा
परिचय
जीवन में भक्ति की यात्रा तब आरंभ होती है जब मनुष्य अपनी इच्छाओं की गहराई को पहचानना प्रारंभ करता है। इच्छाएँ मन का स्वाभाविक तत्त्व हैं, पर जब वे भोग-विलास में उलझ जाती हैं, तब वही इच्छाएँ बंधन बन जाती हैं। श्री प्रेमानंद महाराज जी के सत्संग से एक सुंदर प्रेरणा मिलती है – कि वासना का रूपांतर ही उपासना है।
मुख्य कथा – ध्रुव जी की अटल भक्ति
महाभागवत ध्रुव जी बचपन में ही राजसिंहासन पाने की लालसा लेकर वन में तप करने चले गए। उनकी मां से तिरस्कार सुनकर उनके हृदय में आक्रोश जागा, और उन्होंने ठान लिया कि वे ऐसी पदवी प्राप्त करेंगे जो पिता या पितामह को भी न मिली हो। नारद जी ने उन्हें भगवान का मंत्र दिया। ध्रुव जी ने केवल छह महीनों में असंभव कठिन तप किया और अंततः भगवान का साक्षात्कार हुआ।
जब भगवान प्रकट हुए, ध्रुव जी ने वही पदवी मांगी जिसकी उन्होंने तपस्या की थी। भगवान ने कहा – तथास्तु। किन्तु जैसे ही उन्होंने भगवान के रूप की माधुरी देखी, उनके भीतर पश्चाताप की अग्नि दहक उठी। उन्होंने कहा – “मैंने तो कांच के टुकड़े माँगे, जबकि आपके जैसे हीरे का साक्षात्कार हुआ।” तब वे समझे कि परम सुख भोग में नहीं, भगवत प्रेम में है।
इस कथा का सार
ध्रुव जी की कथा हमें यह शिक्षा देती है कि इच्छाएँ भले छोटे से प्रारंभ हों, पर यदि वे भगवान की ओर मुड़ जाएँ, तो वे स्वयं नष्ट होकर प्रेम में परिवर्तित हो जाती हैं। प्रेम ही वह अग्नि है जो वासना रूपी अंधकार को जला देती है।
मूल प्रेरणा – ‘वासना से उपासना तक’
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जो भी व्यक्ति भगवान से जुड़ता है, चाहे किसी भी भाव से – वह प्रारंभिक साधक है। कोई संकट में भगवान को पुकारता है, कोई चाह रख कर, और कोई केवल प्रेम में। भगवान सबको अपनाते हैं।
इच्छाओं का त्याग तुरंत नहीं होता। लेकिन भक्ति की दिशा में चलते-चलते वे स्वयं मिटने लगती हैं। महाराज जी के अनुसार – यदि मनुष्य वासना को भगवान के चरणों में अर्पित कर दे, तो वही वासना दिव्यता में बदल जाती है।
महाराज जी के तीन उपदेश
- नाम-जप की सातत्यता वासना को शांत करती है।
- भगवान से केवल प्रेम मांगो, वस्तु नहीं।
- दूसरों की ओर गलत दृष्टि न रखो; सबमें वही दिव्यता निवास करती है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
- दैनिक नाम-जप: दिन में निर्धारित समय पर एकाग्र होकर भगवान के नाम का जप करें। मन की चंचलता धीरे-धीरे शांत होगी।
- विचार-शुद्धि: जब भी कोई आकर्षण या वासनात्मक विचार उठे, उसी क्षण ईश्वर को स्मरण करें और कहें – ‘ये भी तुम्हारी लीला है प्रभु।’
- संगति-सात्त्विकता: अपने जीवन में ऐसे लोगों का संग रखें जो भक्ति, करुणा और सादगी की राह पर हैं।
अंतर्मन के लिए चिंतन
प्रतिदिन यह प्रश्न स्वयं से पूछें – “क्या मेरी इच्छा मुझे भगवान की ओर ले जा रही है या संसार की ओर खींच रही है?” इसका उत्तर ही आपके मार्ग का दिशा-सूचक बन जाएगा।
रसपूर्ण उदाहरण – इंद्र और अहिल्या की घटना
देवताओं के राजा इंद्र के पास अनंत अप्सराएँ थीं, किंतु वह भी अपने भीतर के तृष्णा-राक्षस से मुक्त नहीं हो पाया। जब उसने महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या की ओर अनुचित दृष्टि डाली, तब उसके भीतर की वासना ने उसे अधःपतन की ओर ढकेल दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि वासना कभी तृप्त नहीं होती; केवल उपासना ही स्थायी संतोष दे सकती है।
शिक्षा
भोग से तृप्ति नहीं, बल्कि भक्ति से शांति मिलती है। जिस क्षण हम यह समझ लेते हैं, तभी जीवन में प्रभु का अनुभव आरंभ होता है।
आध्यात्मिक निष्कर्ष
महाराज जी स्पष्ट करते हैं – भगवान की करुणा अनंत है। जो उन्हें प्रेम से पुकारता है, वह कभी खाली नहीं लौटता। कभी-कभी भगवान हमारी इच्छाएँ पूर्ण नहीं करते, क्योंकि वे हमें उच्चतर आनंद की ओर ले जाना चाहते हैं। इसीलिए भोग-विलासी इच्छा का रूपांतर प्रेम में करना ही भक्ति का सार है।
यदि आप भी भक्ति और नाम-जप की इस राह में गहराई से उतरना चाहते हैं, तो आप spiritual guidance के माध्यम से प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। वहाँ दिव्य भजनों और संत-वचनों का अनुपम संग्रह है जो हृदय को शांति प्रदान करता है।
FAQs
1. क्या भोग की इच्छा रखना गलत है?
नहीं, क्योंकि यह भी प्रारंभिक साधक की अवस्था है। लेकिन धीरे-धीरे साधना से यह इच्छा ईश्वर प्रेम में बदल जाती है।
2. नाम-जप से मन की अशुद्धि कैसे मिटती है?
नाम-जप से मन में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह स्वतः ही वासनात्मक विचारों की शक्ति को कम करती है।
3. क्या भगवान सभी इच्छाएँ पूरी करते हैं?
भगवान वही पूरी करते हैं जो हमारे कल्याण के अनुरूप हो। कभी-कभी वे इच्छाओं को मिटा देते हैं, जो सर्वोत्तम कृपा है।
4. इस युग में भक्ति का सरल मार्ग क्या है?
सत्संग सुनना, भगवन्नाम जपना, और हृदय से करुणा का व्यवहार करना – यही सरल मार्ग है।
5. क्या गृहस्थ होकर भी उपासना संभव है?
हाँ। परिवार, कार्य और समाज के बीच भी भक्ति संभव है यदि मन में ईश्वर को केंद्र बनाकर कर्म किए जाएँ।
समापन
जीवन की सच्ची सम्पन्नता उसी पल आती है जब मनुष्य कहता है – “प्रभु, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस तुम्हारा सान्निध्य चाहिए।” यही वह क्षण है जब वासना शांति में और उपासना प्रेम में बदल जाती है। प्रेमानंद महाराज जी के उपदेश हमें इसी दिव्य परिवर्तन की ओर प्रेरित करते हैं।
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Originally published on: 2024-02-20T11:42:05Z



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