गुरुजी का दैनिक संदेश: शरणागति का महत्त्व और भगवद स्मरण की आवश्यकता

शरणागति का गूढ़ अर्थ

गुरुजी ने अपने प्रवचन में शरणागति के महत्व को विस्तार से समझाया। शरणागति का अर्थ है पूर्ण समर्पण जो हमें हमारे आराध्य देव के प्रति होती है। जब हम जय जय श्री राधे, जय जय सियाराम, या हर हर महादेव का उच्चारण करते हैं, तो यह हमारे आत्मसमर्पण का प्रतीक बन जाता है। यह इस बात का संकेत है कि हम अपनी पूरी सृष्टि और सत्ता को प्रभु के चरणों में अर्पित कर रहे हैं।

हम समझते हैं कि जब बंदूक की गोली अंतिम होती है, तब भी एक व्यक्ति समर्पण की स्थिति में होता है। इसी प्रकार, जब हमारी हरध्वनियां हमारे आराध्य की उपासना का हिस्सा बन जाती हैं, तब वह सम्पूर्ण आत्मसमर्पण हो जाता है।

भजन और नियमित स्मरण का महत्व

गुरुजी के अनुसार भजन और भगवत स्मरण 24 घंटे चलना चाहिए। माया का थप्पड़ हमें तब तक नहीं छोड़ेगा जब तक हम भगवत स्मरण में लीन नहीं होते। जब तक हम हनुमान जी महाराज जैसे ज्ञानी महापुरुषों की तरह अपने आराध्य के प्रति समर्पित नहीं हो जाते, तब तक माया हमें कभी न कभी विपत्ति में डाल देगी।

निरंतर भजन करना, प्रवचन या समाज सेवा से अधिक कठिन है। हृदय को एकाग्र कर प्रभु में मन को लगाना ही शिष्य की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।

अध्यात्म और धन

गुरुजी ने स्पष्ट किया कि अध्यात्म और धन का कोई संबंध नहीं है। अध्यात्म को धन से खरीदा नहीं जा सकता। आज के समय में हर चीज अर्थ में निहित है, लेकिन अध्यात्म की प्राप्ति केवल भगवत नाम जपने और पवित्र आचरण में होती है।

हमारे ब्रह्म ऋषि और उपनिषदों में भी यह कहा गया है कि अगर निष्काम भाव से प्रवचन न हुआ तो जीवन की धारा नहीं बदलेगी। निष्काम भाव ही असली अध्यात्म है।

सरलता से भगवत प्राप्ति की राह

गुरुजी ने बताया कि हमारे जीवन में भगवान का आश्रय लेकर नाम जप करते हुए आचरण को पवित्र रखना चाहिए। इसमें धैर्य और विश्वास की आवश्यकता है। जैसे गुरु ने अपने शिष्य को टॉर्च की सहायता से रास्ता दिखाया, वैसे ही राम, कृष्ण, राधा के नाम का स्मरण एक दिव्य प्रकाश है।

FAQs

1. क्या भजन और भगवत स्मरण करना आवश्यक है?

हाँ, भजन और भगवत स्मरण करना आत्मा को प्रकाशित करता है और माया से रक्षा करता है।

2. भजन का समय क्या होना चाहिए?

भजन का कोई निर्धारित समय नहीं है। यह आपकी सहूलियत और समर्पण के आधार पर निर्भर करता है।

3. क्या अध्यात्म के लिए धन आवश्यक है?

नहीं, अध्यात्म की प्राप्ति केवल भगवत नाम जपने और पवित्र आचरण से होती है, धन से नहीं।

4. शरणागति क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

शरणागति का अर्थ है अपने आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण। यह भक्त के जीवन में संतुलन और शांति लाता है।

5. कैसे निरंतर भजन और भगवत स्मरण किया जा सकता है?

भागवत चित्त की स्थापना और नियमितता से भजन व स्मरण में निरंतरता बनाए रखना संभव है।

अन्त में, गुरुजी का यह संदेश बताता है कि हमें आत्मनिर्भरता से अधिक भगवान की शरणागति में अपनी स्थिति बनानी होगी। भजन और स्मरण हमारी आत्मा को मजबूती प्रदान करते हैं, और भगवान के नाम के जप से हमें सब कुछ प्राप्त हो सकता है। यह मार्ग धैर्य और विश्वास की राह पर ही चलता है।

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Originally published on: 2024-02-26T07:06:31Z

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